मुफ्त प्रचार चाहिए, बजट का नाम सुनते ही पल्ला झाड़ते हैं अधिकारी
महराजगंज:-यूपी के महराजगंज जिले से बड़ी खबर सरकारी विभागों और अधिकारियों का दोहरा रवैया इन दिनों मीडिया जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक तरफ जहां अपनी योजना, ट्रांसफर-पोस्टिंग या व्यक्तिगत उपलब्धियों का प्रचार कराने के लिए अफसर दिन-रात प्रेस नोट भेजकर मीडिया कवरेज की उम्मीद रखते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं योजनाओं के आधिकारिक विज्ञापन देने की बात आते ही बजट नहीं है कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं।अधिकारी चाहते हैं कि उनकी हर छोटी-बड़ी खबर को अखबारों और पोर्टलों पर प्रमुखता से जगह मिले। लेकिन जब आधिकारिक विज्ञापन बजट जारी करने की बात आती है तो टालमटोल शुरू हो जाती है।इस रवैये का सबसे ज्यादा असर छोटे और स्थानीय मीडिया संस्थानों पर पड़ रहा है। विज्ञापन न मिलने से उनके सामने वित्तीय संकट खड़ा हो रहा है, जबकि सरकारी उपलब्धियों को कवरेज उन्हें मुफ्त में ही देनी पड़ रही है।आलोचकों का कहना है कि व्यक्तिगत ब्रांडिंग और वाहवाही के लिए मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन जैसे ही विज्ञापन के जरिए पारदर्शी भुगतान की बारी आती है, वैसे ही नियम-कानूनों का हवाला देकर बात टाल दी जाती है।मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी महकमे अपनी उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार चाहते हैं तो उन्हें पारदर्शी तरीके से नियमानुसार विज्ञापन बजट जारी करना चाहिए। केवल मुफ्त वाहवाही के लिए मीडिया का इस्तेमाल करना न सिर्फ अनुचित है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के साथ अन्याय भी है।